भास्कर संपादकीय: तेल की कीमतों पर भारत बंद और सरकार की दुविधा

तेल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों पर 22 विपक्षी दलों के भारत बंद ने सरकार को यह संदेश दे दिया है कि यह आर्थिक और राजनीतिक रूप से गंभीर मामला है और इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। बंद के दौरान कांग्रेस और वाममोर्चा के साथ खड़े हुए विभिन्न दलों की विपक्षी एकता ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लगाए गए उस आरोप का भी जवाब दे दिया है कि विपक्ष के पास न कोई नेता है, न कोई नीति और न कोई रणनीति।
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भास्कर संपादकीय: भारत-अमेरिका रक्षा संबंधी संचार समझौते का मतलब

भारत और अमेरिका ने गुरुवार को कामकासा (कम्युनिकेशन्स कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर दस्तखत करते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग के नए द्वार खोल दिए हैं। आज के युग में जमीन-जायदाद और हथियार से भी ज्यादा मूल्यवान चीज है डेटा।
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भास्कर संपादकीय: सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक पहल और अनुदार समाज

देश की सर्वोच्च अदालत ने आखिर समलैंगिकता के संदर्भ में एक ऐतिहासिक और उदार निर्णय दे ही दिया, जिसका एलजीबीटी ही नहीं उदारवादी लोकतांत्रिक समाज को लंबे समय से इंतजार था। इसके बावजूद सवाल यह है कि औपनिवेशिक गुलामी में बुरी तरह जकड़ा और उसी संदर्भ में अपने अतीत की व्याख्या करने पर आमादा समाज क्या उसे दिल से स्वीकार कर पाएगा?

संपादकीय: अनुसूचित जाति उत्पीड़न कानून के विरोध में सवर्णों का गुस्सा

गुरुवार को 35 सवर्ण संगठनों की ओर से अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न अधिनियम में संसद की ओर से किए गए संशोधन के विरुद्ध आहूत भारत बंद का सबसे ज्यादा शोर मध्य प्रदेश में सुनाई दे रहा है, जो उचित ही है, क्योंकि वहां चुनाव है और चुनाव ही वह मौका होता है, जब विभिन्न वर्ग अपने मुद्‌दे रखते हैं। छत्तीसगढ़ में भी संशोधन के खिलाफ प्रतिक्रिया इसी वजह से दिखी है। सुप्रीम कोर्ट से कानून को नरम बनाए जाने के विरोध में जब 2 अप्रैल को दलित संगठनों ने बंद का आयोजन किया था तो सबसे ज्यादा हिंसा ग्वालियर संभाग में

भास्कर संपादकीय: क्यों हमारे जनप्रतिनिधियों को चाहिए आचार संहिता?

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपनी पुस्तक ‘मूविंग फारवर्डः ए ईयर इन ऑफिस’ के विमोचन के मौके पर सांसदों-विधायकों के लिए आचार संहिता बनाने का जो सुझाव दिया है वह सर्वथा उचित है लेकिन, सवाल यह उठता है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधी कैसे जाएगी।
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