30 अप्रैल को इस तरह खुलेंगे बदरीनाथ के कपाट

ओम प्रकाश भट्ट/गोपेश्वर,एन बी टी न्यूज।
गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलने के बाद अब केदारनाथ और बदरीनाथ के कपाट खुलने की तैयारी तेज हो गई है। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने बताया कि 28 अप्रैल की दोपहर को शीतकालीन गद्दी स्थल जोशीमठ के नृसिंह मन्दिर से आदि गुरु शंकराचार्यजी की गद्दी एवं गाडुघड़ा-तेल कलश यात्रा, श्री रावल जी के साथ पांडुकेश्वर के योगध्यान बदरी मंदिर के लिए प्रस्थान करेगी। इसके साथ ही श्री बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

जानें ब्रज से 84 कोस की परिक्रमा का क्या है महत्व

वेद-पुराणों में ब्रज की 84 कोस की परिक्रमा का बहुत महत्व है, ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। इस परिक्रमा के बारे में वारह पुराण में बताया गया है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं।

श्री तुंगनाथ मन्दिर के कपाट खुले, आप भी करें दर्शन

गोपेश्वर। एनबीटी न्यूज।

हिमालय में पंचकेदार श्रृंखला के मुख्य मंदिरों में एक श्री तुंगनाथ मंदिर के कपाट भी दर्शनों के लिए खोल दिए गए है। तुंगनाथ मंदिर भी पंचकेदार श्रृंखला के अन्य मंदिरों की तरह शीतकाल में सर्दी की वजह से बंद रहता हैं तथा शीतकालीन पूजा मक्कू गांव के मार्केंडेय मंदिर में होती है। बुधवार सुबह श्री तुंगनाथ भगवान की उत्सव डोली पैदल यात्रा के साथ तुंगनाथ मन्दिर पहुंची, जिसके बाद परंपरागत पूजा अर्चना के बाद कपाट खुलने की प्रक्रिया संपन्न हुई और साढ़े दस बजे मंदिर के कपाट खोले गए।

इलाहाबाद कुंभ में रोप-वे का आनंद ले सकेंगे श्रद्धालु

संजय पांडे
कुंभ के दौरान इलाहाबाद पहुंचनेवाले श्रद्धालु रोप-वे का आनंद भी ले सकेंगे। यह रोप-वे संगम के ऊपर से गुजरेगा। रोप-वे बनाने की योजना करीब तीन दशक पहले एक धार्मिक संस्था ने बनाई थी, लेकिन तब सेना के विरोध के चलते यह योजना परवान नहीं चढ़ सकती थी। हालांकि अब पर्यटन विभाग कुंभ को ध्यान में रखते हुए इस योजना पर तेजी से काम कर रहा है। पूर्व में सेना के विरोध को देखते हुए इस बार रोप-वे का मार्ग भी बदल दिया गया है।

भक्तों का इंतजार खत्म, खोले गए बाबा केदारनाथ के कपाट

उत्तराखंड के चार धाम की यात्रा अक्षय तृतीया शुरू हो चुकी है लेकिन आज बाबा केदारनाथ के मंदिर के कपाट मंत्रोच्चारण के बाद रविवार सुबह छह बजकर दस मिनट पर खोल दिए गए। जिसके बाद गृह गर्भ में मौजूद स्वयंभू शिवलिंग को पूजा अर्चना की गई। इसदिन मंदिर के द्वार खुलने के बाद अंदर जल रहे दीप को देखना बड़ा ही पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि मंदिर के बंद होने पर देवतागण भगवान शिव की पूजा करते हैं और इस दीप को जलाए रखते हैं।