खरीदारों का मोर्चा

कच्चे तेल की कीमतों में ओपेक की हमलावर पॉलिसी से निपटने के लिए भारत ने एक बड़ी पहल की है। अगर यह कोशिश कामयाब रही तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। भारत तेल खरीदने वाले देशों का एक क्लब बनाना चाहता है ताकि तेल विक्रेताओं के साथ बेहतर शर्तों पर मोलभाव किया जा सके और ऑइल ब्लॉक में ओपेक देशों का दबदबा कम करने के लिए ज्यादा क्रूड ऑइल रूस और अमेरिका से मंगाया जा सके।

इफ्तार की सियासत

देश में एक बार फिर इफ्तार की राजनीति जोर पकड़ती दिखी। बुधवार को दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी खासी चर्चा में रही। हालांकि उसी दिन बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने भी ‘तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं’के लिए इफ्तार पार्टी आयोजित की और उसे भी अच्छी कवरेज मिली। वैसे तो इफ्तार पार्टियों के जरिए राजनीतिक संदेश देने की परिपाटी देश में नई नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में इस ट्रेंड में थोड़ा बदलाव दिखने लगा था। कथित हिंदुत्ववादी राजनीति वाले इस दौर में इफ्तार को लेकर सरकारी दायरे में अतिरिक्त सतर्कता दिखनी लाजिमी है, लेकिन विपक्षी कांग्रेस भी इसे लेकर असहज महसूस करने लगी थी।

जनता का भरोसा जीतें

पीडीपी और बीजेपी का लगभग चार साल पुराना बेमेल गठबंधन अक्सर डगमगाता हुआ दिखने के बाद आखिरकार ढह गया और जम्मू-कश्मीर एक बार फिर राज्यपाल शासन के अंदर आ गया। अपने समूचे राजनीतिक इतिहास में यह राज्य कुल 8 बार राज्यपाल शासन के तहत आया है। इस बार खास बात यह है कि विधानसभा अपनी छह साल की निर्धारित अवधि के अधबीच में है और कोई सरकार बन पाने की संभावना दूर तक नजर नहीं आ रही है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के सामने सबसे बड़ा सवाल उस जमीनी लोकतांत्रिक ढांचे को बचाए रखने का है, जिसे नब्बे के दशक का खतरनाक दौर पार होने के बाद वहां धीरे-धीरे करके खड़ा किया गया था। पिछले डेढ़ दशकों में तकनीकी वजह

जीरो बिजनस का फंडा

काले धन के खिलाफ सरकार की मुहिम का असर कंपनियों के कामकाज पर दिखने लगा है। जो कंपनियां नए नियमों के मुताबिक ढल नहीं पा रही हैं, उनका किस्सा तेजी से खत्म होने की राह पर है। इसकी ताजा मिसाल के तौर पर आई है वह खबर, जिसके मुताबिक देश की करीब 30 फीसदी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द होने वाला है। इन कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में कोई बिजनस नहीं किया है। टैक्स बचाने के लिए बनाई गई ऐसी शेल कंपनियों के बारे में काफी पहले से बात होती रही है। वास्तविक कंपनियां अपने खाते दुरुस्त दिखा सकें, इसका सबसे आसान रास्ता ये फर्जी कंपनियां ही हुआ करती हैं। कई कंपनियां अपने कारोबार का वाइट हिस्सा तो मूल खाते में दि

बढ़ती गर्मी के कुसूरवार

जिस हिसाब से हम हिंदुस्तानी कार, एसी, फ्रिज और कंप्यूटर के पीछे भाग रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब गर्मी के मामले में हम सब-सहारन अफ्रीका को टक्कर देते दिखेंगे। अभी तक हमें लगता था कि ग्लोबल वार्मिंग का अपराध विकसित यूरोपीय देशों का ही किया-धरा है। भारत में जब-तब कुछ मौसमी गड़बड़ियां दिखती भी हैं तो उनके पीछे प्राकृतिक कारण हो सकते हैं। लेकिन हमारी इस समझ को दरकिनार करते हुए आईआईटी दिल्ली ने पिछले सौ सालों के तापमान का अध्ययन करके बताया है कि भारत के औसत तापमान में हुई बढ़ोतरी के पीछे कोई प्राकृतिक कारण न होकर सिर्फ और सिर्फ इंसानी हाथ है और हमारे अभी के जीवन-व्यवहार की इसमें एक अहम भूमिका है।